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दलित मित्र की सरकार में नहीं लग पा रही अम्बेडकर व बुद्ध की मूर्तियां

डाॅ. भीमराव अम्बेडकर की जयन्ती के अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ को अम्बेडकर महासभा ने दलित मित्र की उपाधि से नवाज़ा है।
बाराबंकी जिले के देवा थाना क्षेत्र के सरसौंदी गांव में ग्राम सभा के अभिलेखों में 0.202 हेक्टेयर भूमि जिसका गाटा संख्या 312 है अम्बेडकर पार्क के नाम से दर्ज है। गांव वासी अम्बेडकर जयन्ती के अवसर पर डाॅ. अम्बेडकर की प्रतिमा लगाना चाह रहे थे। अम्बेडकर जयन्ती के कार्यक्रम की पुलिस से लेकर सांसद प्रियंका सिंह रावत तक से अनुमति ले ली गई थी। किंतु कार्यक्रम के ठीक पहले लेखपाल कमलेश शर्मा ने झूठी आख्या लगा दी कि उक्त भूमि का वाद बंदोबस्त चकबंदी अधिकारी के यहां चल रहा है जिसमें गांव के ही दो नागरिकों कबीर अहमद व प्रमोद चैहान को गवाह दिखाया गया है। चकबंदी कार्यालय से सम्पर्क करने पर यह बताया गया कि उक्त भूमि को लेकर उनके यहां कोई बाद लम्बित नहीं है और दोनों गवाह पछता रहे हैं कि उनसे धोखे से हस्ताक्षर करा लिए गए। शिकायतकर्ता कन्हैया लाल एक ईंट भट्ठा मालिक हैं व ग्राम सभा के निवासी भी नहीं हैं। स्पष्ट है कि लेखपाल दलित विरोधी मानसिकता से ग्रसित है।
सीतापुर जिले के थानगांव थाना क्षेत्र के गांव गुमई मजरा ग्राम सभा रानीपुर गोड़वा की घटना तो और भी रोचक है। गांव के दलित निवासी गुलशन पुत्र बनवारी अपनी निजी भूमि पर भगवान बुद्ध व डाॅ. अम्बेडकर की मूर्तियां लगाना चाह रहे हैं। जहां ये मूर्तियां लगनी हैं वहीं सटी भूमि पर एक अधूरा मंदिर का ढांचा खड़ा है। बिना छत के मात्र चार दिवारें हैं और अंदर कुछ भी नहीं। किसी देवी-देवता की मूर्ति नहीं लगी है। ये भूमि जगरानी पत्नी स्व. मेड़ीलाल, जो पूर्व में ग्राम प्रधान भी रहे चुके हैं, की है और वे भी चाहतीे हैं कि गुलशन की भूमि पर बुद्ध व अम्बेडकर की प्रतिमाएं लगे। बल्कि वर्तमान में सुरक्षा की दृष्टि से दोनों मूर्तियां जगरानी के ही पक्के घर में रखी गई हैं। इलाके के कुछ सर्वण लोगों ने भारतीय जनता पार्टी के विधायक ज्ञान तिवारी के संरक्षण में बुद्ध व अम्बेडकर की मूर्तियों के रखे जाने का विरोध किया है। ये सभी लोग ग्राम पंचायत के निवासी नहीं है और इस अर्थ में बाहरी हैं। पुलिस ने आख्या लगा दी है कि बगल में देवी का स्थान होने से बुद्ध व अम्बेडकर की मूर्तियां रखे जाने के वक्त विवाद खड़ा हो सकता है। जगरानी, जिनकी भूमि पर अधूरे मंदिर का ढांचा खड़ा है, को मूर्तियां लगाए जाने से कोई आपत्ति नहीं है और न ही उनका गुलशन के परिवार से कोई विवाद है।
अब दोनों ही गांवों के दलितों को जिलाधिकारी को आवेदन देकर शासन से मूर्तियां रखने की अनुमति दिलाने की मांग करनी पड़ेगी। दोनों मामलों में लालफीताशाही में मामले का उलझा दिया गया है। पती नहीं अनुमति मिलने में कितने दिन लगें अथवा अनुमति न भी मिले। ऐसी स्थिति में शायद न्यायालय की शरण में जाना पड़ेगा। दलित मित्र मुख्यमंत्री के शासन में उनके दल के लोगों व शासन-प्रशासन की दलित विरोधी मानसिकता साफ दिखाई पड़ती है।
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